Saturday, 3 May 2014

kushwah ki shayri: हर एक चेहरे को ज़ख्मों का आईना ना कहो ये ज़िन्दग...

kushwah ki shayri: हर एक चेहरे को ज़ख्मों का आईना ना कहो
ये ज़िन्दग...
: हर एक चेहरे को ज़ख्मों का आईना ना कहो ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा ना कहो ना जाने कौन सी मजबूरियों का कैदी हो वो साथ छोड़ गया है तो ...
हर एक चेहरे को ज़ख्मों का आईना ना कहो
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा ना कहो

ना जाने कौन सी मजबूरियों का कैदी हो
वो साथ छोड़ गया है तो बेवफा ना कहो

तमाम शहर ने नेजों पर क्यूँ है उछाला मुझे
ये इत्तेफाक था तुम इसे हादसा ना कहो

ये और बात के दुश्मन हुआ है आज मगर
वो मेरा दोस्त था कल तक उसे बुरा ना कहो

हमारे ऐब हमें उँगलियों पे गिनवाओ
हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा ना कहो

मैं वाकियात की ज़ंजीर का नहीं कायल
मुझे भी अपने गुनाहों का सिलसिला ना कहो

ये शहर वो है जहाँ राक्षस भी हैं 'कन्नौजी'
हर एक तराशे हुए बुत को देवता ना कहो

Wednesday, 23 April 2014

मुश्किलें जरुर है, मगर ठहरा नही हूँ मैं.
मंज़िल से जरा कह दो, अभी पहुंचा नही हूँ मैं.

कदमो को बाँध न पाएंगी, मुसीबत कि जंजीरें,
रास्तों से जरा कह दो, अभी भटका नही हूँ मैं.

सब्र का बाँध टूटेगा, तो फ़ना कर के रख दूंगा,
दुश्मन से जरा कह दो,अभी गरजा नही हूँ मैं.!