Saturday, 3 May 2014

हर एक चेहरे को ज़ख्मों का आईना ना कहो
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा ना कहो

ना जाने कौन सी मजबूरियों का कैदी हो
वो साथ छोड़ गया है तो बेवफा ना कहो

तमाम शहर ने नेजों पर क्यूँ है उछाला मुझे
ये इत्तेफाक था तुम इसे हादसा ना कहो

ये और बात के दुश्मन हुआ है आज मगर
वो मेरा दोस्त था कल तक उसे बुरा ना कहो

हमारे ऐब हमें उँगलियों पे गिनवाओ
हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा ना कहो

मैं वाकियात की ज़ंजीर का नहीं कायल
मुझे भी अपने गुनाहों का सिलसिला ना कहो

ये शहर वो है जहाँ राक्षस भी हैं 'कन्नौजी'
हर एक तराशे हुए बुत को देवता ना कहो

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